युगों-युगों के नायक

राम ,एक अवतरित मनुष्य, जिन्होंने प्राचीन त्रेतायुग में  मर्यादा के नवीन आदर्श प्रस्तुत किये।हर युग में पाप का स्तर अलग अलग रहा ,इसी अनुसार ईश्वर का इनसे निपटने के माध्यम भी उसी तरह  समयानुसार ही रहा।

जहाँ त्रेता में एक ऐसा खलनायक रावण जो   ज्ञान से  भी विभूषित था ,द्वापर में कंश जैसा हत्यारा ,कौरव जैसे अन्यायी ।त्रेता में  युद्ध मर्यादित रहा क्योंकि उस समय के खलनायको का स्तर उतना गिरा नही था,मसलन राक्षस(बुरी प्रविर्ती) कुल में भी विभीषण ,कुम्भकर्ण ,मंदोदरी जैसे नैतिक लोग भी रहे। उस समय रावण का वध मर्यादा के मानदंड स्थापित करने के लिए  बहुत अहम हो गया था ।

युग बदला द्वापर आया,अपने साथ पाप और अनैतिकता के नए आयाम लाया।इस दफा उसका उन्मूलन किया एक और अवतरित मनुष्य श्रीकृष्ण ने लेकिन उनका माध्यम पूरी तरह मर्यादित नही रहा ,इसलिये हम केवल राम को  ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहते है ।धर्म की रक्षा हर युग मे सर्वोपरि थी ,द्वापर में त्रेता से भी घृणित कृत्य हुए,लेकिन युद्ध मे कदाचित कृष्ण ने  छल के मार्गो का अनुसरण करने में भी गुरेज़ नही किया क्योंकि धर्म की विजय हर माध्यमों से बढ़कर थी । त्रेता में तो केवल सीता का हरण हुआ ,द्वापर में तो द्रौपदी का चीर हरण तक हुआ ।कुकृत्य का दंड उन्हें जरूर मिला,जो समाज के लिए केवल प्रतिकात्मक सन्देश तक रह गए।

 हम द्वापर के इन घटनाओं को अपने त्योहार के प्रतीक  रूप में नही मनाते,क्योकि हम बड़ी से भी बड़ी  बुराई  का खात्मा एकदम अच्छे और सात्विक ढंग से करने में विश्वास रखते है।


इसी परिकल्पना को सार्थक करते है राम ,एक  आदर्श शिष्य के रूप में  वह विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम की रक्षा और यज्ञ पूर्ण कराने निकल पड़ते है।एक आदर्श पुत्र के रूप में एक आदेश पर वन निर्गमन हो जाते है, मित्र के रूप में आगे बढ़ बाली का वध करते है,एक रणनीतिकार के स्तम्भ बन वन निवासी को संगठित करते है,एक कुशल सेनापति के रूप में नेतृत्व करते है और एक बहुत ही सामान्य मानव की तरह हारने के द्वार पर खड़े शक्ति की आराधना भी करते है और दसवे दिन विजय प्राप्त कर समाज को सत्य की जीत का संदेश देते है।
हर एक रूप में युगों योगों के नायक राम ही रहे है।👏👏👏
#युग_युग_के_नायक

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