रामानंद सागर की उत्तर रामायण और विश्वशनीयता

रमानंद सागर का सीरियल 'रामायण' लोकप्रियता के नव कीर्तिमान रच रहा है लेकिन उसी कथा के नायक श्रीराम के विषय में कई तरह के बेबुनियाद बाते जो प्रचलन में है उनका उचित अंत अभी तक नही हो सका है।
          बहुत से लोग  सीता के अग्निपरीक्षा को राम के स्त्रीविरोधी होने के चश्मे से देखते है।प्रखर नारीवादी समूह इस तथ्य को नारी पर आदि काल से होने वाले अत्याचार के तौर पर बताकर अपने स्वार्थ सिद्धि के प्रायोजन को सफ़ल भी करने में लगे रहते है।वास्तविकता मात्र इतनी है कि अग्नि का प्रज्वलन केवल असली सीता को वापस लेने के लिए ही किया गया था।श्रीराम ने यह गूढ़ रहस्य अपने प्राणों से भी प्यारे भाई लक्ष्मण तक से छुपा कर रखी।रामचरितमानस के अरण्य कांड के दोहा 23 और लँका कांड के दोहा108 -109 से इस सच का पर्दाफाश किया जा सकता है कि सीता जी ने कोई भी परीक्षा नही दी थी।
रमानंद सागर द्वारा दर्शाये गया यह कथा कोई अगर ध्यान से देखे तो उसे सहज ही  सम्पूर्ण राम कथा का ज्ञान हो जाएगा।रमानंद ने मुख्यतः पाँच रामायणों को अपने सीरियल का आधार बनाया जिनमे क्रमशः  वाल्मीकि रामायण,रामचरितमानस, कम्ब रामायण अत्यधिक महत्वपूर्ण है।वाल्मीकि रामायण संस्कृत में,मानस अवधि में और कम्बन तमिल भाषाओं में लिखे गए  महाकाव्य है।

श्रीराम के विषय में दो अत्यंत ही भ्रामक दुर्भावनाएं फैलाई जाती है और उस पर बहुत से तर्क कुतर्क भी दिए जाते है।पहली यह कि अयोध्या राज्य के नागरिकों मुख्यतः एक धोबी के सन्देह करने पर  राम ने  राजधर्म का पालन करते सीता का परित्याग कर दिया ।दूसरी यह कि राम ने एक दलित व्यक्ति  शम्बूक का वध कर दिया था।

वह राम जो निषादराज को मित्र बनाते है ,शबरी के झूठे बैर खा लेते है वह दलित विरोधी हो ही नही सकते फिर वध तो बहुत दूर की बात है।वह राम जो यह कहते है कि सीताराम अलग नाम कहाँ यह तो एक ही है वह अपने पत्नी को त्याग कर ही नही सकते।
विशेषज्ञ बताते है कि महर्षि वाल्मीकि ने केवल लंकाकांड जिसे युद्धकाण्ड भी कहते है वही तक का रामायण लिखा था।वाल्मीकि राम के समकालीन लेखक थे उन्होंने इसी आशय में उस वक्त का असल इतिहास लिखा था लेकिन एक सुनियोजित साजिश के तहत वाल्मीकि के मूल रचना में उत्तर कांड जोड़ा गया और उसमें राम के बेदाग़ छवि को धूमिल करने के लिए भ्रामक प्रसंग रचे गए।बहुत से संस्कृत के विद्वान इस तथ्य की पुष्टि करते है कि उत्तरकाण्ड की शैली ,भाषा ,लिखने का तरीका वाल्मीकि रामायण के अन्य कांड से सर्वदा भिन्न है।कालांतर में भारत में बहुत राम कथाएं लिखी गयी लेकिन यह किवंदती,भ्रामकता जोड़ पकड़ती ही गयी कि राम ने सीता का परित्याग किया।
रामचरितमानस में भी तुसलिदास जी ने बाल कांड ,अयोध्या कांड,अरण्य कांड,किष्किंधा, सुंदर कांड,लंका कांड और उत्तर कांड में राम के कथा को विभक्त कर लिखी ।रामचरितमानस के उत्तर कांड में कही भी लव कुश ,सीता परित्याग का ज़िक्र नही आता।
  
यही कारण था कि रमानंद सागर जी  ने भी कथा का समापन राम जी के राज्याभिषेक तक करने का निश्चय कर लिया था और एपिसोड 78 के बाद रामायण को बंद कर दिया था।वह यह मानते थे कि आगे की कथा के स्त्रोत विश्वशनीय नही है लेकिन बाद में दर्शकों के मांग पर और वाल्मीकि समाज के अत्यधिक दवाब देने के कारण उन्होंने आगे की कहानी को अलग 44 एपिसोड में बांटकर उसे उत्तर रामायण का नाम दिया।

उत्तर रामायण के एपिसोड 1 में अपने प्रारंभिक सन्देश में रमानंद सागर जी उक्त बातो का जिक्र करते हुए कहते है कि तुसलिदास राम के अनन्य भक्त है इसलिए उनसे आगे की कथा लिखी ही नही गयी ।वह वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड का हवाला देते है जो उनके अनुसार सभी प्रसंगों से पहले ही लिख दिया गया था यह दावा भी गले नही उतरता क्योकि पहले ही अध्याय में जो लेखक खुद को राम के संप्रतम यानी समकालीन बताता है वह केवल उत्तरकाण्ड ही पहले क्यों लिखेगा।वह कम्ब रामायण का भी जिक्र करते है और बताते है कि सीता परित्याग की कहानी वहाँ भी लिखी गयी है।
रमानंद सागर जी के इन  बातों से मैं कतई इतेफाक नही रखता क्योकि वह अपने ही कथन को काटते है ।सम्पूर्ण कथा में उन्होंने मानस को आधार बनाया लेकिन अब वह इस स्त्रोत के कमियों को उज़ागर करने में लग जाते है।वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में शम्बूक वध का भी वर्णन है ,उससे तो वह बहुत ही सफ़ाई से बच निकलते है।क्या यह सही है कि एक ही स्त्रोत के दो घटनाओं को सुविधानुसार चयन कर दिखाया जाए?।वह कथा को 78 एपिसोड तक खत्म करने के अपने पूर्व निर्धारित सोच को भी काटते है। मेरा सभी से यह आग्रह है कि जब आपलोग 44 एपिसोड्स का उत्तर रामायण देखे तो इसे महज कल्पना माने लेकिन 78 एपिसोड रामायण जो आप देख चुके है उसे निर्विवाद सत्य।
सबसे सही तो यही होता कि रमानंद सागर जी राम के राज्याभिषेक तक कि असल विश्वसनीय कथा को ही संज्ञान में रखते और काल्पनिक, अविश्वसनीय भ्रामक प्रसंगों को स्थान ही नही देते लेकिन TRP के चक्कर में और कुछ दवाबों में वह शायद ऐसा न कर सके इसीलिए उन पर 10 साल तक मुकदमा भी चला यह बात बहुत कम लोग ही जानते होंगे।
इसमे कोई दो राय नही की युद्धकाण्ड तक रमानंद सागर ने राम कथा के साथ सम्पूर्ण न्याय किया और वही दिखाया जो सच है ।

मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के विषय में हर सच को जानना जरूरी ही नही उसका समग्र प्रचार करना हमारी जिम्मेदारी भी है।राम की कथा केवल कहानी नही भारतवर्ष का गौरवशाली इतिहास और अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर की निशानी भी है।इस तरह यह हम सभी का दायित्व बनता है कि राम के असल जिंदगी जो मर्यादा का प्रतिबिंब   रहा अगर उस को धूमिल करती कोई भी भ्रामक बाते व्याप्त है तो उनका खण्डन भी होना ही चाहिए।


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