अल्पसंख्यक

भारतीय सविंधान सभा जब सविंधान बना रही थी उसी के समानांतर काल मे  देश का धार्मिक आधार पर  विभाजन भी हो रहा था।दूरदर्शी नेताओं को बटवारे के बाद भारत मे रुक जाने वाले अल्पसंख्यकों की  बहुत  चिंता थी ।उन्हें डर था कि भविष्य में कही कोई ऐसी सरकार न बन जाए जो अल्पसंख्यक के उपासना पद्धिति ,संस्कार,रहन सहन पर रोक लगा दे इसलिए सविंधान के आर्टिकल 29 और आर्टिकल 30 में इनके संरक्षण हेतु कुछ प्रावधान किए गए जिनमे इन्हें अपने पँथ या मज़हब की शिक्षा के लिए संस्थान खोलने और चलाने के पूरे अधिकार दिए गए।
                 यह विदित रहे कि पूरे सविंधान में  पँथ आधारित अल्पसंख्यक की कोई भी मुक़म्मल परिभाषा नही  दी गयी  और यह शब्द  सविंधान में सिर्फ एक जगह ही प्रयुक्त हुआ।वैसे तो सविंधान में दो तरह के अल्पसंख्यक होने की बात कही गयी है पहला पंथ या मजहबी आधार पर दूसरा भाषाई आधार पर लेकिन हमारे देश की राजनीती में केवल पहला आधार ही ज़्यादा तवोज्जो पाता रहा है।दुनियाभर के किसी भी सविंधान में अल्पसंख्यक समुदाय को इतने अधिकार नही मिले जितने भारतीय आईन में दिए गए है।
                         भारत का बहुसंख्यक समुदाय सदा से पंथ निरपेक्ष रहा है इसलिए यहाँ रह रहे किसी भी अल्पसंख्यक को कभी कोई भी परेशानी नही हुई।शायद यही कारण था कि सविंधान में प्राप्त संरक्षण को लागू करने के लिए किसी भी अल्पसंख्यक आयोग की आवश्यकता आज़ादी के 40 साल बाद तक नही हुई।  पीवी नरसिम्हा राव की सरकार के समय 1992 में एक वैधानिक अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया जिसने  1993 में एक अधिसूचना जारी कर  उपबंध 2(C) के तहत पाँच पंथो को अल्पसंख्यक माना जिनमें इस्लाम,सिख,पारसी,बुद्ध और ईसाई शामिल थे।
                         यू तो तुष्टिकरण आज़ादी के बाद से ही चालू था लेकिन इनमें तेज़ी आई जब इन्हें कानूनी जामा पहनाया गया।1991 के जनगढ़ना के आकड़ो के अनुसार उक्त 5 पंथो को पूरे देश के  सांख्यिकी के आधार पर अल्पसंख्यक कहा गया वो भी बिना किसी उचित  परिभाषा के।बहुत बाद में 2014 में कांग्रेस की सरकार के द्वारा जैनो को भी इस सूची में शामिल कर लिया गया।

          आज के दौर में केंद्र सरकार के अंदर दो स्तर पर  अल्पसंख्यक को संरक्षण दिया जा रहा है।पहला अल्पसंख्यक मंत्रालय दूसरा विदेश मंत्रालय के अल्पसंख्यक मामलों के तहत।अल्पसंख्यक मंत्रालय का वार्षिक बजट 4700 करोड़ रहा ,जिनके तहत बहुत जन कल्याण के योजनाएं संचालित की जाती है।
                   
भारत के 8 राज्य ऐसे है जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक है वो राज्य है लक्षयदीप, जम्मू कश्मीर, पँजाब  और पूर्वोत्तर के 5 राज्य जिनमें मिज़ोरम, नागालैंड, मेघालय,अरूणांचल प्रदेश और मणिपुर शामिल है। क्या इन 8 राज्यो के हिन्दुवों को अल्पसंख्यक वाले विशेष लाभ नही मिलने चाहिए??जरा सोचिए इन राज्यो में जो हिन्दू है उन पर क्या बीतती होगी जब वो देखते होंगे की वहाँ के बहुसंख्यक अल्पसंख्यक के मज़े लूट रही है।क्या अल्पसंख्यक जनकल्याण के योजनाओं का लाभ उन्हें नही मिलना चाहिए?क्या उन्हें अपनी धार्मिक शिक्षण संस्थान खोलने की मदद नही मिलनी चाहिए??जब देश मे Sc, St का निर्धारण राज्य की सांख्यिकी पर किया जाता है फ़िर अल्पसंख्यक वर्ग के निर्धारण के लिए यह मानदंड क्यों नही???

सुप्रीम कोर्ट इस दिशा में कुछ नही कर सकती क्योंकि किसे अल्पसंख्यक का दर्जा देना है और किसे नही वो केंद्र सरकार का अधिकार है जो उसे 1993 के अधिसूचना से प्राप्त है।ब्रिटिश काल में 1899 में जब जनगणना हुई थी तब यह तय हुआ था कि हिन्दू बहुसंख्यक होंगें और यही आजतक चला आ रहा है।

मुस्लिम जो इस देश के बहुसंख्यक अल्पसंख्यक है जिनकी विश्व मे  आबादी   देखे तो  भारत मे दूसरे स्थान पर है  इंडोनिशिया के बाद ।भारत में मुस्लिम आबादी 17 करोङ से भी ज़्यादा हो चुकी है ,लेकिन यह घोर विडंबना है कि उन्हें अभी तक अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है।उनके लिए उनकी शरीयत है,जो कि उनका निजी सिविल क़ानून है।उनके लिए अल्पसंख्यक आयोग का संरक्षण है।उनके लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय का भारी भरकम बजट और योजनाएं भी है।उनको अपने मज़हब के लिए मदरसे  खोलनें चलाने की अधिकार जिन्हें सरकारी ऐड भी दिया जाता है

यूनाइटेड नेशन अल्पसंख्यक को परिभाषित करते हुए कहता है कि जो समुदाय राजनीतिक, सामाजिक रूप से पिछड़े हुए है और जिनकी संख्या नगण्य या बहुत ही कम है वो उस देश के अल्पसंख्यक होंगे।इस के तहत अगर हम देखे तो मुस्लिम समुदाय को यह दर्जा अब बिल्कुल ही बेईमानी है।भविष्य में एक ऐसा समय आएगा जब मुस्लिम आबादी विश्व मे सबसे ज़्यादा भारत मे होगीं और यह समुदाय भारत का अल्पसंख्यक ही रहेगा।इससे ज्यादा हास्यास्पद इस देश के लिए कुछ भी नही होगा।

लक्षयदीप जहाँ 96 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है ,जम्मू कश्मीर जहाँ 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और पूर्वोत्तर के 5 राज्यो में जहाँ ईसाई बहुसंख्यक है वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दू को उनके अधिकार ना मिलना बहुत ही दुखद है।अल्पसंख्यक आयोग की 1992 की 2(C) अधिसूचना  आर्टिक्ल 14 का उल्लंघन है क्योंकि यहाँ उचित वर्गीकरण नही किया गया है।सरकारे अल्पसंख्यक के अधिकार दिए जा रही है बिना यह जाने की असल मे अल्पसंख्यक है कौन।
भारत का हिन्दू हमेशा से हाशिये पर ही रहा है ,अगर सरकारे या संसद राज्यवार अल्पसंख्यक समुदाय निश्चित नही कर पा रही है तो बहुत उचित है कि इस अल्पसंख्यक कल्याण के ढकोसले को ही खत्म कर दे क्योंकि एक तरफ देश पँथ निरपेक्ष है दूसरी तरफ़ कुछ पंथ के लिए विशेष प्रावधान लेकिन यह ढकोसला खत्म करने के लिए भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और एक मजबूत  राजनीतिक ज़िगर  चाहिए।अल्पसंख्यक के एक ख़ास तबके के तुष्टीकरण ने देश को बहुत नुकसान पहुँचाया है ,समय आ गया है कि संसद इस नाज़ुक मामले पर उचित निर्णय ले।

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