SECULARISM=पँथ निरपेक्षता & RELIGION doesn't mean धर्म
सेक्युलरिज्म एक ऐसा शब्द है जो आधुनिक भारत की राजनीति में जहाँ तहाँ ही कौंधता रहता है।जब हमारे देश का सविंधान बन रहा था तब कुछ सदस्यों ने सेक्युलरिज्म शब्द को सविंधान प्रस्तावना में जगह देने की बात उठायी थी तब यह मत औंधे मुंह गिर गया था
सेक्युलरिज्म शब्द की उत्पत्ति पाश्चात्य जगत से है।यूरोप के सामाजिक आंदोलन के बाद यह तय हुआ कि सरकार के कामकाज में चर्च या पोप की दखलंदाजी बंद होगी।चर्च सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नही करेगा।राज्य चर्च या रिलीजन से विमुख होकर काम करेगा।इसी विमुखता को यूरोप के प्रमुख भाषा अँग्रेजी में सेक्युलरिज्म कहा गया है।जब भारत देश का सविंधान निर्मित किया जा रहा था तो राज्य के रिलीजन से विमुख होकर काम करने की भावना को सेक्युलरिज्म के रूप में जगह दी गई।जब भारतीय सविंधान का हिंदी संस्करण लिखा जाने लगा तब बहुत ही विचार विमर्श के बाद सेक्युलरिज्म का हिंदी अनुवाद पंथ निरपेक्ष किया गया।
पंथ की प्रमुख विशेषताए क्या है?
रिलिजन यूरोप का एक शब्द है जिसका भारत देश मे समानार्थी पंथ है।पंथ की प्रमुख रूप से चार विशेषताए होती है।पहली उस पंथ के खोजकर्ता, उसे शुरू करने वाले दैवीय अवतार दूसरी एक विशिष्ट पूजा करने का तरीका ,तीसरी एक मान्य पवित्र किताब और चौथी कोई विशेष पवित्र स्थान।
जैसे अगर हम इस्लाम पँथ की बात करे तो खोजकर्ता पैग़म्बर मोहम्मद साहब ,पूजा या इबादत करने का तरीका नमाज ,पवित्र किताब कुरान औऱ पवित्र स्थान मक्का मदीना।ऐसे ही अगर हम ईसाई पँथ की बात करे तो खोजने वाले जीसस क्राइस्ट ,पूजा पद्धति चर्च में प्रेयर करना ,पवित्र किताब बाइबल और पवित्र स्थान रोम ।इस तरह आप पाएँगे की सभी पंथ की यह विशेषताए रहेगी।
अगर हम सनातन धर्म ,आज के परिपेक्ष्य में हिंदू धर्म की बात करें तो यहाँ 33 कोटि यानी 33 प्रकार के देवी देवता ,सहस्त्र पवित्र पुस्तकें ,सहस्त्र तीर्थस्थल, सहस्त्र पूजा पद्धिति मौजूद है ।हिन्दू धर्म में बहुत से पँथ स्वतंत्र रूप से गतिमान है।भारत का धर्म यूरोप की भाषा अंग्रेजी के रिलिजन शब्द से भिन्न है
RELIGION शब्द का अर्थ धर्म नही
अंग्रेजी का रिलीजन शब्द का अर्थ सनातन धर्म से बिल्कुल ही भिन्न है रिलीजन से विश्वास का भाव सूचित होता है और विश्वास परिवर्तित हो सकता है, किसी को एक विशेष विधि में विश्वास हो सकता है और वह इस विश्वास को बदल कर दूसरा ग्रहण कर सकता है लेकिन सनातन धर्म उस कर्म का सूचक है जो बदला नहीं जा सकता। अगर हम इसे विज्ञान की दृष्टि से समझे तो जैसे जल से उसकी तरलता अलग नही की जा सकती है ,अग्नि से उसकी ऊष्मा अलग नही की जा सकती ठीक उसी प्रकार जीव से उसके कर्म को अलग नहीं किया जा सकता ।सनातन धर्म जीव का शाश्वत अंग है।सनातन धर्म वह है जिसका न आदि है न अंत,इसको किसी भी सीमा में नही बांधा जा सकता यह तो ब्रह्मांड के सभी जीवों का है इसलिए यह साम्प्रदायिकता के थोड़ा भी करीब नही है।
धर्म शब्द का अर्थ अत्यंत ही व्यापक
धर्म शब्द का अर्थ अत्यंत ही व्यापक
धर्म शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत है इसका एक और अर्थ है जो पदार्थ विशेष में हमेशा ही रहता है जैसे आग के साथ ऊष्मा और प्रकाश ,जैसे जल के साथ तरलता। कोई भी इंसान परिस्थिति विशेष में एक विशिष्ट प्रकार के विश्वास को अपना सकता है इस प्रकार वह अपने को मुसलमान, ईसाई, बौद्ध या किसी भी अन्य सम्प्रदाय का मानने वाला बन सकता है लेकिन यह सनातन धर्म नही है।
मनुस्मृति एक ऐसी पुस्तक जो तथाकथित अज्ञानियों के प्रत्यंचे पर हमेशा ही चढ़ी रहती है।उसी मनुस्मृति की सहिंता में धर्म के दस लक्षण भी बताए गए है जैसे धैर्य, क्षमा (सहिष्णुता), मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, मन-वचन एवं कर्म की शुद्धता, इन्द्रीयनिग्रह, शास्त्रों का ज्ञान, आत्मज्ञान, सत्यभाषण एवं अक्रोध।यह बात बिल्कुल साफ़ है कि धर्म एक विशाल महासागर है जिसमे सभी पंथो के मूल तत्व मिलते है इसलिए हम चाह के भी धर्म से निरपेक्ष नही हो सकते ।यही कारण था सविंधान प्रस्तावना में 42 संशोधन से जोड़े गए सेक्युलरिज्म शब्द का जब हिंदी अनुवाद हुआ तो इसे पंथ निरपेक्ष लिखा गया।भारत के हर नागरिक को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि भारतीय सविंधान पँथ निरपेक्ष है धर्म निरपेक्ष नही।
मनुस्मृति में उस समय की तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए कुछ बाते ऐसी जरूर लिखी है जो आज अप्रसांगिक और योग्य नही है लेकिन इसका अर्थ यह नही की वह पूरी ही बेकार है।धर्म के अर्थ का सन्दर्भ केवल मनुस्मृति में ही नही मिलता गीता के चौथे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक की दूसरी पंक्ति में श्रीकृष्ण कहते हैं, 'लोग भिन्न-भिन्न मार्गों द्वारा प्रयत्न करते हुए अंत में मेरी ही ओर आते हैं।' 'पंथ' अर्थात मार्ग, रास्ता, सड़क, रोड, जो मंजिल तक पहुंचाता है। यहां मंजिल है-धर्म। अब तक की मुख्य और मनोवैज्ञानिक चुनौती यह रही है कि आदमी के अंदर धर्म के इन दस लक्षणों में से अधिक से अधिक को कैसे स्थापित किया जाए। इन्हीं उपायों को गौतम बुद्ध ने अपनी तरह से बताया, तो महावीर स्वामी, गुरुनानक देव, नारायण स्वामी आदि महान एवं पवित्र आत्माओं ने अपनी-अपनी तरह से। ये उपाय ही हैं 'पंथ', जिसे संविधान की प्रस्तावना में 'विश्वास एवं उपासना' कहा गया है। 'पंथ' को हम धर्म तक पहुंचने का विधान कह सकते हैं, पद्धति कह सकते हैं।
सविंधान में विश्वास,धर्म और उपासना की व्याख्या अलग अलग
सविंधान में विश्वास, धर्म और उपासना तीन शब्दों को अलग अलग करके लिखा गया है। यह बात महत्वपूर्ण भी है और विचारणीय भी है। स्पष्ट है कि विश्वास का अर्थ-सम्प्रदाय, मत, पंथ, मजहब से है, और उपासना का अर्थ उसकी पूजन विधि से है, जबकि धर्म को सभी नैतिक नियमों का समुच्चय मानकर हर व्यक्ति के लिए समान माना गया है।
सविंधान में विश्वास, धर्म और उपासना तीन शब्दों को अलग अलग करके लिखा गया है। यह बात महत्वपूर्ण भी है और विचारणीय भी है। स्पष्ट है कि विश्वास का अर्थ-सम्प्रदाय, मत, पंथ, मजहब से है, और उपासना का अर्थ उसकी पूजन विधि से है, जबकि धर्म को सभी नैतिक नियमों का समुच्चय मानकर हर व्यक्ति के लिए समान माना गया है।
पंथ निरपेक्षता’ ही राज्य का धर्म है। इसका अभिप्राय है कि भारत में कोई राजकीय चर्च या शाही मस्जिद या राजकीय मंदिर नही होगा। भारत का सर्वोच्च राजकीय मंदिर संसद होगी और उस संसद में विधि के समक्ष समानता के आदर्श के दृष्टित सर्वमंगल कामना (सबके लिए समान विधि का निर्माण) किया जाएगा। सामान्य बातचीत में हमने धर्म के अर्थ को ही मटियामेट कर दिया। यहां सम्प्रदायों, पंथों और मजहबों को धर्म माना गया है। ऐसा मानकर भारी भूल की गयी है। इस भारी भूल के पीछे वास्तविक कारण अंग्रेजी भाषा का है, क्योंकि उसके पास धर्म का पर्यायवाची कोई शब्द है ही नही। उसने जिसे ‘रीलीजन’ कहा है वह सम्प्रदाय अथवा मजहब का पर्यायवाची या समानार्थक है। अंग्रेज धर्म के अर्थ को नही जानते थे और वह संसार में सबसे प्यारी वस्तु बाईबिल और उसकी मान्यताओं को मानते थे, इसलिए उन्होंने धर्म का अर्थ इन्हीं से जोड़ दिया। इसी बात का अनुकरण अन्य मतावलंबियों ने किया। इस प्रकार अनेक धर्मों के होने का भ्रम पैदा हो गया। अब इसे रटते रटते यह भ्रम इतना पक्का हो गया है कि टूटे नही टूट रहा। भारत में ही बहुत लोग हैं जो, भारत को विभिन्न धर्मों का देश मानते हैं इसलिए सर्वधर्म समभाव के गीत गाते हैं। उन्हें नही पता कि भारत कभी भी सर्वधर्म समभाव का समर्थक नही रहा। भारत मानव धर्म का समर्थक रहा है और उसने सर्व सम्प्रदाय समभाव को अपनी संस्कृति का प्राणतत्व घोषित किया है।
यदि हम 'धर्म' को इस विराट रूप में लेते हैं, तो वह निरपेक्ष रह ही नही सकता क्योंकि उसमें सब कुछ समाहित है इसलिए 'पंथनिरपेक्ष' तो हुआ जा सकता है, 'धर्मनिरपेक्ष' नहीं और यही भारतीयता भी है।
जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने सन् 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में कहा था, 'मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव कहता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है।'
जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने सन् 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में कहा था, 'मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव कहता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है।'
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