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UNIFORM CIVIL CODE

भारतीय सविंधान देश के सबसे बड़े और अंतिम  मान्य क़ानून के तौर पर जब शक्ल अख्तियार कर रहा था तब सविंधान निर्माताओं के बीच एक अहम सवेंदनशील मसला था,विविध प्रकार के पंथ ,मज़हब में  विश्वास करने वाले लोगों को उनके हिस्से की आज़ादी देने के साथ साथ यह सुनिश्चित करना कि कानून के समक्ष सभी जन एक होंगे। समान नागरिक संहिता की बात  उस समय यह कह के टाल दिया गया था कि  देश के नागरिक और सामाजिक ढाँचा इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नही लेकिन  अनुच्छेद 44 में नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत भविष्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड को देश में सभी समुदायों के साथ मुक़म्मल वार्ता कर  उनको विश्वास में लेकर लागू करने के निर्देश  दिए गए थे।  सविंधान के भाग 4 डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पालिसी की कुँजी आर्टिकल 37 है जिसके तीन प्रमुख आयाम है।पहला की यह गैर न्यायीक है,मतलब कोर्ट में इसके तहत कुछ भी मांग नही की जा सकती।दूसरा की देश चलाते वक्त यह सरकार के ध्यान में होना चाहिए।तीसरा की जब भी संसद कोई कानून बनाए तब सभी निर्देशित तत्व संज्ञान में रखने होंगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 बरस बाद ...

ARTICLE 356 AND DEMOCRACY

जब हम लोकतंत्र कहते है तो आशय होती है जनता, और हम आश्रित हो जाते है भारत के आईन पर,सर्वोच्च न्यायालय का कार्य है यह देखना की सरकार की कार्यप्रणाली उस लोकतंत्र के आश्रित  तथ्यात्मक सविंधान के तहत चल रही है या नही?? अनुच्छेद 356 राज्यपाल को  विशेषाधिकार देता है की वह अपने विवेक अनुसार यह तय कर सके कि राज्य की शासन सविंधान के अनुरूप चल रही है या नही?अब जब विवेकानुसार निर्णय की स्वतंत्रता मिल जाती है तो फ़िर अपनी मर्जी की जोर आजमाइश भी शुरू होना लाज़मी है। 356 तब और अहम हो जाता है जब किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नही मिलता,फिर सत्ता की  गेंद राज्यपाल के पाले में और जनता मात्र दर्शक। लोकतंत्र फिर बहुत सीमित नजर आने लगता है। त्रिशंकु जनादेश के बाद क़ायदे अनुसार राज्यपाल चुनाव में सबसे बड़े दल विजेता के विधाननेता को सरकार बनाने का न्योता देते है। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने पहले भाजपा को निमंत्रण दिया ,भाजपा ने मना किया क्योंकि उसकी साथी पार्टी शिवसेना  सत्ता के मद में अंधी होकर ,अपनी विचारधारा से समझौता कर ,मुख्यमंत्री की पद की लालची बन गयी थी। जनादेश भाजपा -शिवसेना गठबंधन को था,लेक...

Unshared Love

"जीवन में न सँगीत लिखेंगे, केवल तन्हाई का गीत लिखेंगे। वो जब तक न मिल जाएगी, केवल उसके ख़ातिर  ही प्रीत लिखेंगे।" डायरी के सबसे आख़िर पन्ने में दर्ज पंक्तियों में उसने अपने  गह...

युगों-युगों के नायक

राम ,एक अवतरित मनुष्य, जिन्होंने प्राचीन त्रेतायुग में  मर्यादा के नवीन आदर्श प्रस्तुत किये।हर युग में पाप का स्तर अलग अलग रहा ,इसी अनुसार ईश्वर का इनसे निपटने के माध्यम भी उसी तरह  समयानुसार ही रहा। जहाँ त्रेता में एक ऐसा खलनायक रावण जो   ज्ञान से  भी विभूषित था ,द्वापर में कंश जैसा हत्यारा ,कौरव जैसे अन्यायी ।त्रेता में  युद्ध मर्यादित रहा क्योंकि उस समय के खलनायको का स्तर उतना गिरा नही था,मसलन राक्षस(बुरी प्रविर्ती) कुल में भी विभीषण ,कुम्भकर्ण ,मंदोदरी जैसे नैतिक लोग भी रहे। उस समय रावण का वध मर्यादा के मानदंड स्थापित करने के लिए  बहुत अहम हो गया था । युग बदला द्वापर आया,अपने साथ पाप और अनैतिकता के नए आयाम लाया।इस दफा उसका उन्मूलन किया एक और अवतरित मनुष्य श्रीकृष्ण ने लेकिन उनका माध्यम पूरी तरह मर्यादित नही रहा ,इसलिये हम केवल राम को  ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहते है ।धर्म की रक्षा हर युग मे सर्वोपरि थी ,द्वापर में त्रेता से भी घृणित कृत्य हुए,लेकिन युद्ध मे कदाचित कृष्ण ने  छल के मार्गो का अनुसरण करने में भी गुरेज़ नही किया क्योंकि धर्म की...

नेताजी की विरासत

कहते हैं भारत त्योहारों का देश है  लेकिन जब बात होती है स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय  त्योहारों की तब रौनक कुछ औऱ ही होती है।अमूमन  हर त्योहारों पर अपने अपने इष्टों को ...

Detective rays and Ganges

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पिता-पुत्र    👨‍👦घाट की सीढ़ियों पर बैठे हुए गंगा नदी के सानिध्य में एक रमणीय सवेरे 🌅 का दर्शन कर रहे थे।पिता अपने जीवन के कोलाहल को नदी के बहाव में मिलाने में जहाँ व्यस्त थ...