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TESTING TESTING &TESTING

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Pandemic challenge is on and one of the primary method to fight this is to test.Experts agree that mass testing for COVID-19, the disease caused by the coronavirus, would allow positive cases to be isolated and help identify those who came in contact with them, helping to curb further transmission. But how does testing happen and how does it help?  NAAT tests The most commonly used coronavirus tests are the WHO-recommended Nucleic Acid Amplification Tests (NAAT), which detect the SARS-CoV-2 virus responsible for the COVID-19 disease.   The specimen is usually collected from the upper respiratory tract using the nasopharyngeal swab technique - in which a sample is gathered from the throat behind the nose, containing a mixture of mucous and saliva.Samples are brought to a specialised laboratory and tested for SARS-CoV-2 using a real-time reverse-transcription polymerase chain reaction (rRT-PCR) assay - a method used to detect the presence of "specific genetic material from ...

Indian Republic is not secular

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Indian republic is not secular. Indian republic is not secular. Yes, you read it correctly.  I have the ample points to prove my point.Although I am not a constitutional expert but after pondering a lots of facts and considering various resources I have taken this charge .I suggest you to go through till the end and then make any conclusion. BEGINING OF THE STORY The basic thought of constitution makers behind accepting the concept of secularism is that the state should act devoid of religion.Rights given under the article 26 to article 30 meant for giving religious freedom to citizens but the same articles are being used to deny that freedom to a vast majority of people. If one sees the constitutional debate when these articles were drafted there would be a complete sense of déjà vu when minority activist presented unreasonable demands but the provisions were passed. Ironically this anomaly was brought to attention  in 1995 by a famous  parliamentarian Sye...

SECULARISM=पँथ निरपेक्षता & RELIGION doesn't mean धर्म

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सेक्युलरिज्म एक ऐसा शब्द है जो आधुनिक भारत की राजनीति में जहाँ तहाँ ही कौंधता रहता है।जब हमारे देश का सविंधान बन रहा था तब कुछ सदस्यों ने सेक्युलरिज्म शब्द को सविंधान प्रस्तावना में जगह देने की बात उठायी थी  तब यह मत औंधे मुंह  गिर गया था  सेक्युलरिज्म शब्द की उत्पत्ति पाश्चात्य जगत से है।यूरोप के सामाजिक आंदोलन के बाद यह तय हुआ कि सरकार के कामकाज में चर्च या पोप की दखलंदाजी बंद होगी।चर्च  सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नही करेगा।राज्य चर्च या रिलीजन से विमुख होकर काम करेगा।इसी विमुखता को यूरोप के प्रमुख भाषा अँग्रेजी  में  सेक्युलरिज्म कहा गया है।जब भारत देश का सविंधान निर्मित किया जा रहा था तो राज्य के रिलीजन से विमुख होकर काम करने की भावना को सेक्युलरिज्म के रूप में  जगह दी गई।जब भारतीय सविंधान का हिंदी संस्करण लिखा जाने लगा तब बहुत ही विचार विमर्श के बाद सेक्युलरिज्म का हिंदी अनुवाद पंथ निरपेक्ष किया गया। पंथ की प्रमुख विशेषताए क्या है? रिलिजन यूरोप का  एक शब्द है जिसका भारत देश मे समानार्थी पंथ है।पंथ की ...

अल्पसंख्यक

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भारतीय सविंधान सभा जब सविंधान बना रही थी उसी के समानांतर काल मे  देश का धार्मिक आधार पर  विभाजन भी हो रहा था।दूरदर्शी नेताओं को बटवारे के बाद भारत मे रुक जाने वाले अल्पसंख्यकों की  बहुत  चिंता थी ।उन्हें डर था कि भविष्य में कही कोई ऐसी सरकार न बन जाए जो अल्पसंख्यक के उपासना पद्धिति ,संस्कार,रहन सहन पर रोक लगा दे इसलिए सविंधान के आर्टिकल 29 और आर्टिकल 30 में इनके संरक्षण हेतु कुछ प्रावधान किए गए जिनमे इन्हें अपने पँथ या मज़हब की शिक्षा के लिए संस्थान खोलने और चलाने के पूरे अधिकार दिए गए।                  यह विदित रहे कि पूरे सविंधान में  पँथ आधारित अल्पसंख्यक की कोई भी मुक़म्मल परिभाषा नही  दी गयी  और यह शब्द  सविंधान में सिर्फ एक जगह ही प्रयुक्त हुआ।वैसे तो सविंधान में दो तरह के अल्पसंख्यक होने की बात कही गयी है पहला पंथ या मजहबी आधार पर दूसरा भाषाई आधार पर लेकिन हमारे देश की राजनीती में केवल पहला आधार ही ज़्यादा तवोज्जो पाता रहा है।दुनियाभर के किसी भी सविंधान में अल्पसंख्यक समुदाय को इतने अधि...

रामानंद सागर की उत्तर रामायण और विश्वशनीयता

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रमानंद सागर का सीरियल 'रामायण' लोकप्रियता के नव कीर्तिमान रच रहा है लेकिन उसी कथा के नायक श्रीराम के विषय में कई तरह के बेबुनियाद बाते जो प्रचलन में है उनका उचित अंत अभी तक नही हो सका है।           बहुत से लोग  सीता के अग्निपरीक्षा को राम के स्त्रीविरोधी होने के चश्मे से देखते है।प्रखर नारीवादी समूह इस तथ्य को नारी पर आदि काल से होने वाले अत्याचार के तौर पर बताकर अपने स्वार्थ सिद्धि के प्रायोजन को सफ़ल भी करने में लगे रहते है।वास्तविकता मात्र इतनी है कि अग्नि का प्रज्वलन केवल असली सीता को वापस लेने के लिए ही किया गया था।श्रीराम ने यह गूढ़ रहस्य अपने प्राणों से भी प्यारे भाई लक्ष्मण तक से छुपा कर रखी।रामचरितमानस के अरण्य कांड के दोहा 23 और लँका कांड के दोहा108 -109 से इस सच का पर्दाफाश किया जा सकता है कि सीता जी ने कोई भी परीक्षा नही दी थी। रमानंद सागर द्वारा दर्शाये गया यह कथा कोई अगर ध्यान से देखे तो उसे सहज ही  सम्पूर्ण राम कथा का ज्ञान हो जाएगा।रमानंद ने मुख्यतः पाँच रामायणों को अपने सीरियल का आधार बनाया जिनमे क्रमशः  वाल्मीकि रामायण,...

UNIFORM CIVIL CODE

भारतीय सविंधान देश के सबसे बड़े और अंतिम  मान्य क़ानून के तौर पर जब शक्ल अख्तियार कर रहा था तब सविंधान निर्माताओं के बीच एक अहम सवेंदनशील मसला था,विविध प्रकार के पंथ ,मज़हब में  विश्वास करने वाले लोगों को उनके हिस्से की आज़ादी देने के साथ साथ यह सुनिश्चित करना कि कानून के समक्ष सभी जन एक होंगे। समान नागरिक संहिता की बात  उस समय यह कह के टाल दिया गया था कि  देश के नागरिक और सामाजिक ढाँचा इसके लिए अभी पूरी तरह तैयार नही लेकिन  अनुच्छेद 44 में नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत भविष्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड को देश में सभी समुदायों के साथ मुक़म्मल वार्ता कर  उनको विश्वास में लेकर लागू करने के निर्देश  दिए गए थे।  सविंधान के भाग 4 डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पालिसी की कुँजी आर्टिकल 37 है जिसके तीन प्रमुख आयाम है।पहला की यह गैर न्यायीक है,मतलब कोर्ट में इसके तहत कुछ भी मांग नही की जा सकती।दूसरा की देश चलाते वक्त यह सरकार के ध्यान में होना चाहिए।तीसरा की जब भी संसद कोई कानून बनाए तब सभी निर्देशित तत्व संज्ञान में रखने होंगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 बरस बाद ...

ARTICLE 356 AND DEMOCRACY

जब हम लोकतंत्र कहते है तो आशय होती है जनता, और हम आश्रित हो जाते है भारत के आईन पर,सर्वोच्च न्यायालय का कार्य है यह देखना की सरकार की कार्यप्रणाली उस लोकतंत्र के आश्रित  तथ्यात्मक सविंधान के तहत चल रही है या नही?? अनुच्छेद 356 राज्यपाल को  विशेषाधिकार देता है की वह अपने विवेक अनुसार यह तय कर सके कि राज्य की शासन सविंधान के अनुरूप चल रही है या नही?अब जब विवेकानुसार निर्णय की स्वतंत्रता मिल जाती है तो फ़िर अपनी मर्जी की जोर आजमाइश भी शुरू होना लाज़मी है। 356 तब और अहम हो जाता है जब किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नही मिलता,फिर सत्ता की  गेंद राज्यपाल के पाले में और जनता मात्र दर्शक। लोकतंत्र फिर बहुत सीमित नजर आने लगता है। त्रिशंकु जनादेश के बाद क़ायदे अनुसार राज्यपाल चुनाव में सबसे बड़े दल विजेता के विधाननेता को सरकार बनाने का न्योता देते है। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने पहले भाजपा को निमंत्रण दिया ,भाजपा ने मना किया क्योंकि उसकी साथी पार्टी शिवसेना  सत्ता के मद में अंधी होकर ,अपनी विचारधारा से समझौता कर ,मुख्यमंत्री की पद की लालची बन गयी थी। जनादेश भाजपा -शिवसेना गठबंधन को था,लेक...